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जिले (District) बने, पर क्या आपने कभी सोचा है हमारा राजस्थान (Rajasthan) भी बने जिसमे रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, के साथ शिक्षा,स्वास्थ्य न्याय और कानून व्यवस्था हो

कोई बधाई दे रहा है तो कोई धन्यवाद दे रहे है। जिलो( District) के टुकड़े कर जिला (District) मुख्यालयो की घोषणा तो सरकार ने कर दी,

पदाधिकारियों को नियुक्तियां भी दे दी, जो यह सुनिश्चित करता है की सरकार के पास धन की कोई कमी नही है, सरकारी खजाने से लाखो करोड़ो रुपए कर्मचारियों अधिकारियों को बतौर तनख्वा के दिए जा रहे, जिसका धरातल पर कोई विशेष परिणाम दिखाई नही देगा। क्योंकि मध्यम वर्ग किसान और ग्रामीण लोग तो पुराने जिलों (District) में भी कर्ज से जीवन यापन करते आए हैं, और नए जिले मे भी कर्ज और बंधुवा मजदूरी से जीवन यापन होना है।


लोग खुश हैं या नहीं लेकिन नेता और राजनेतिक अभिनेता खुशियों से फूले नहीं समा रहे, अब इसकी वजह क्या हो सकती हैं यह कोई आम आदमी नही बता सकता। क्योंकि आजादी के सत्तर साल बाद भी आम आदमी को उसके अधिकारो की पूर्ति नही हुई है। आजादी के समय देश कर्जे में था और आज भी भारत में पैदा होने वाला बच्चा जन्म के समय से कर्ज के बोझ तले ही पलता बढ़ता है फिर भी कोई सरकार आज तक इस बोझ को कम करने के कदम पर काम नही किया बल्कि इनके कदमों पीआर कर्ज का बोझ इतना बढ़ा दिया है की आज का मध्यम वर्ग का व्यक्ति न तो जीवन जी सकता और न ही जीने की उम्मीद उसे मरने देती है।

नए जिला (District) मुख्यालय लोगो को न्याय देंगे इसकी खुशी मनाई जा रही है और होनी भी चाहिए क्योंकि रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद अब सरकार को न्याय व्यव्स्था को सुदृढ़ करने के लिय भी कदम उठाना जरूरी था। अब मन में सवाल यह उठता है की आजादी के सत्तर साल बाद भी देश में पैदा होनेवाले बच्चे पर कर्ज का बोझ हो उस देश या प्रदेश की भौगोलिक मानचित्र पर रेखाएं खींचने के बजाय कमजोर वर्ग के लोगो का हाथ खींचा जाए जिससे कमजोर भी जीवन की मुख्य धारा के साथ जुड़ कर जीवन जी सके।

सरकार देश को बुलेट ट्रेन की सौगात देने की तैयारियों की।रु रेखा बना रही वही मध्यम वर्ग के परिवार शिक्षा ऋण, गृह ऋण, रोजगार ऋण में उलझ कर भुखमरी और बेरोजगारी के चलते ट्रेनों से केटी कर मरने की तैयारियों में लगा है।
प्रदेश की वर्तमान दशा को देखते है तो सरकारी स्कूलों में कोई अपने बच्चो को नही पढ़ना चाहते भले हीं वो सरकारी स्कूल के ही शिक्षक क्यों न हो, यही हालत अस्पतालों का है जहां मरीजों की भीड़ इतनी होती है की कोई चिकित्सा विभाग का कार्मिक वहां भीड़ को देख सेवा नही देना चाहते।

आज की सरकार की जिम्मेदारी तो केवल सरकारी कर्मचारियों को इधर उधर करने के लिय ही बनती है जिनका काम कर्मचारियों की खुशी के लिय रहा गया क्योंकि उनके लिए मानवाधिकार होते है। इसी लिए काम हो या न हो लेकिन समय पर उनकी सैलेरी मिलती है, घर के आस पास पेटिंग हो ताकि समय मिलने पर राजनीति भी कर सके।
और इनके लिए हीं सरकार भी रूप रेखा बनाती है ताकि ऐसे सरकार के वफादार कर्मचारियों के लिय सरकारी खजाना खाली होता रहे और चुनावी समय आने पर उनका गुणगान कर सके।

आज का दौर भी सरकारी नौकरी का जो हों गया, जिसे देखो सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा है। उससे पूछा जाए क्यों करना है सरकारी नौकरी जवाब शायद यही होगा — काम नही करना पड़ता हैं फिर भी तनख्वा टाइम पर मिलती है। जब एक मजदूर या प्राइवेट जॉब करने वाले कार्मिक को कम न करने पर सजा के तौर पर उसकी तनख्वा काट ली जाती है तो यह फार्मूला सरकारी कार्मिकों पर भी लागू होना न्याय संगत है लेकिन काई सरकार इस और कदम नही उठती।

राजस्थान के नक्शे में नए जिलों की स्तिथि अवलोकन किया जा रहा है

लेकिन राजस्थान (Rajasthan) की शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, न्याय और कानून व्यवस्था का अवलोकन करने वाले लोगो को इंसानियत मर जाने से आज राजस्थान (Rajasthan) का मध्यम वर्ग सरकार द्वारा उपेक्षित लोक कल्याण का शिकार हो रहा हैं। किसी ने सही कहा है जब लोग अपने अधिकारो को चुनाव के समय बांटी जाने वाली शराब के साथ पैसे ले कर मत को बेच देते है तो उससे बनने वाली सरकार से कल्याण कारी नीतियों अपेक्षा करना भी अपराध के समान है।

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